हरिद्वार, 30 सितंबर ,2026
उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय, हरिद्वार के ‘भाषा एवं आधुनिक ज्ञान विज्ञान विभाग’ द्वारा हिंदी समारोह के अंतर्गत ऑनलाइन माध्यम से ‘राष्ट्रीय हिंदी व्याख्यानमाला’ का सफल आयोजन किया गया। इस व्याख्यानमाला का विषय ‘पंजाब प्रदेश की हिंदी साहित्य को देन’ रखा गया था।
कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति, प्रो. रमाकांत पांडेय ने की।
समारोह का संचालन करते हुए देश के प्रतिष्ठित साहित्यकार एवं व्याख्यानमाला के संयोजक, प्रो. दिनेश चंद्र चमोला ने कहा कि मेरा सौभाग्य था है कि मुझे देश के वरिष्ठ शताधिक विद्वानों यथा – भीष्म साहनी, कमलेश्वर, विष्णु प्रभाकर, नागार्जुन, डॉ. राम विलास शर्मा प्रभृति विद्वानों का स्नेह, उनसे दुर्लभ साक्षात्कार करने तथा उत्प्रेरित होने के अनेक अवसर मिले । आचार्य, ज्ञान परंपरा का चल -विश्वकोश होता है, ये शोधार्थियों, विद्यार्थियों व शिक्षकों को ऐसे आचार्यों से सीखना चाहिए….जो शब्द, समय व जीवन का समुचित उपयोग दुर्लभ ज्ञान के संग्रहण में ही करते हैं ।
अंत में प्रभावी धन्यवाद ज्ञापन विभाग के अध्यापक, डॉ अनूप बहुखंडी ने प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम के आमंत्रित विद्वान , हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय (धर्मशाला) के कुलाधिपति, प्रो. हर महेंद्र सिंह बेदी ने अपने ओजस्वी व्याख्यान में पंजाब और हिंदी साहित्य के सदियों पूर्व से अटूट संबंध पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ऋग्वेद के अध्ययन के बिना पंजाब के साहित्य को सही रूप में नहीं समझा जा सकता। पाणिनीय अष्टाध्यायी और श्री गुरु नानक देव जी की वाणी सहित विभिन्न ग्रंथों के संदर्भ देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदी साहित्य के इतिहास और उसके रचना-संसार पर पंजाबी भाषा का गहरा प्रभाव है तथा इसमें पंजाबी के अमिट हस्ताक्षर मौजूद हैं।
प्रोफेसर बेदी ने उल्लेख किया कि ऋग्वेद संपूर्ण एशिया महाद्वीप का प्रथम प्रामाणिक ग्रंथ है। हिंदी साहित्य के इतिहास को पंजाब के संदर्भ से जोड़ते हुए उन्होंने बताया कि सिद्धों और नाथ जोगियों में से 21 में से 11 सिद्ध,नाथ, योगी पंजाब की भूमि से ही संबंध रखते थे। पंजाब का प्रसिद्ध शहर जालंधर भी योगी जालंधर नाथ जी के नाम पर ही बसा है।
उन्होंने आगे कहा कि भारतीय साहित्य के मध्यकाल (भक्तिकाल) की आचार संहिता श्री गुरु ग्रंथ साहिब में समाहित है। साथ ही, उत्तर-मध्यकाल की बोलियों के विकास पर भी पंजाब का व्यापक प्रभाव रहा है। पंजाब के योगदान के बिना हिंदी और संपूर्ण भारतीय साहित्य का इतिहास अधूरा है।
भारतीय भाषाओं की विकास यात्रा पर विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि देश की समस्त भाषाएं संस्कृत से निकली हैं और संस्कृत भी कई रूपों में पंजाब की पावन भूमि में संबद्ध है। हिंदी साहित्य के इतिहास में पृथ्वीराज रासो का प्रथम कवि चंद वरदाई भी लाहौर (पंजाब) के रहने वाले थे।
अतः भारतीय भाषाओं के समग्र अध्ययन के लिए पंजाबी साहित्य और पंजाब में प्रचलित भाषाओं को समझना अनिवार्य है।
प्रोफेसर बेदी ने जानकारी दी कि श्री गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल 36 प्रमुख वाणीकारों (भक्तों व संतों) में से 6 गुरु साहब तथा अन्य वाणीकार हिंदी तथा भारतीय भाषाओं से हैं। उन्होंने उदाहरण देकर स्पष्ट किया कि श्री गुरु ग्रंथ साहिब में संत कबीर की वाणी को किस प्रकार विशिष्ट स्थान दिया गया है। अंत में उन्होंने इस बात पर बल दिया कि श्री गुरु ग्रंथ साहिब और पंजाब के साहित्य को शामिल किए बिना हिंदी साहित्य का कोई भी इतिहास लिखना अधूरा होगा, और इसके लिए सबसे प्रामाणिक शोध आधार श्री गुरु ग्रंथ साहिब ही है।
हिंदी माह समापन के अवसर पर विभाग में आयोजित भाषण प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार, एम ए हिंदी के छात्र, श्री सिद्धार्थ जोशी, द्वितीय पुरस्कार, सुश्री अनीता एवं तृतीय पुरस्कार, श्री सुमित ढौंडियाल ने प्राप्त किया । निर्णायक के रूप में साहित्य विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष, डॉ. हरीश चंद्र तिवाड़ी जी थे । उन्होंने छात्रों को संबोधित भी किया ।
इस अवसर पर उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय प्राध्यापक डॉ कंचन तिवारी, डॉ सुमन प्रसाद भट्ट, डॉ सुशील चमोली डॉ, सूर्य प्रकाश पांडेय, डॉ सर्वेश ओझा एवं मनोज गहतोड़ी, डॉ रेखा तथा अन्य छात्र-छात्राएं, प्रदीप मिश्रा, अक्षत भट्ट, आदित्य तिवारी, नरेश तिवारी, गौरव उनियाल, शेखर, मोहित, विशाखा ,जतिन, मीनाक्षी ,सुजल बहुगुणा ,शिवम नैनवाल ,रूपा गोस्वामी, प्रियांशु, यशोदा, हिमांशु ,कीर्ति, रिया चौधरी, कमला पांडे, अंजलि आदि उपस्थित रहे।

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