आज शिक्षण स्तर क्यों गिर रहा है और अभिभावक सरकारी विद्यालयों से निजी विद्यालयों की ओर क्यों जा रहे हैं? इस सवाल का जवाब केवल शिक्षकों की कार्यक्षमता या विद्यालयों की व्यवस्थागत कमियों में तलाशना पर्याप्त नहीं है। इसके पीछे शिक्षा व्यवस्था में लगातार बढ़ती गैर-शैक्षणिक गतिविधियों, सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन का दबाव, रिपोर्टिंग और कागजी औपचारिकताओं का भी बड़ा योगदान है।
उत्तराखंड के विद्यालयों में इन दिनों पढ़ाई से अधिक कार्यक्रमों की भरमार दिखाई देती है। आए दिन कोई दिवस, कोई अभियान, कोई प्रतियोगिता, कोई महोत्सव, कोई आयोजन और उसके बाद फोटो, वीडियो और प्रोग्रेस रिपोर्ट। व्हाट्सऐप के तमाम ग्रुपों में कई दिन पहले से लेकर कार्यक्रम वाले दिन की सुबह तक सूचनाएँ आती रहती हैं—अमुक दिन क्या गतिविधि करनी है, कौन-सा दिवस मनाना है, किस कार्यक्रम की फोटो भेजनी है और किसकी रिपोर्ट तैयार करनी है।
ऐसे माहौल में कभी-कभी यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि बच्चा किताब खोले या पहले कैमरे की ओर देखे? शिक्षक पाठ पढ़ाए या कार्यक्रम की रिपोर्ट बनाए?
गतिविधियाँ निश्चित रूप से सीखने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। बच्चों को मंच मिलना चाहिए, उनकी प्रतिभाओं को अवसर मिलना चाहिए और पाठ्यक्रम से जुड़ी रचनात्मक गतिविधियाँ भी होनी चाहिए। समस्या गतिविधियों से नहीं, गतिविधियों की अति से है। जब गतिविधि सीखने का माध्यम न रहकर स्वयं लक्ष्य बन जाए, तब शिक्षा धीरे-धीरे पीछे छूटने लगती है।
एक शिक्षक के पास सीमित समय है। उसी समय में उसे कक्षा शिक्षण करना है, पाठ्यक्रम पूरा करना है, कॉपियाँ जाँचनी हैं, बच्चों की शैक्षणिक कठिनाइयों को समझना है और परीक्षा की तैयारी करानी है। लेकिन इसी समय में उसे विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन करना, बच्चों की फोटो-वीडियो बनाना, रिपोर्ट तैयार करना और अलग-अलग व्हाट्सऐप समूहों में अपडेट भेजना पड़ता है।
इसके अलावा मतदान, मतगणना, भवनगणना, जनगणना, विद्यालय संबंधी विभिन्न प्रभार और अन्य गैर-शैक्षणिक जिम्मेदारियाँ भी हैं। चौबीस घंटे मोबाइल पर आने वाले निर्देशों, उनके अनुपालन और फिर अनुपालन की रिपोर्ट भेजने का दबाव अलग है।
ऐसे में शिक्षक के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है—वह शिक्षक कब बने?
कभी चित्रकला, कभी निबंध, कभी प्रदर्शनी, कभी विज्ञान, गणित, सामाजिक विज्ञान या संस्कृत की प्रतियोगिता; कभी कोई दिवस, कभी कोई अभियान; कभी मुख्यमंत्री मेधावी परीक्षा, NMMS, एप्टीट्यूड टेस्ट या उपलब्धि सर्वेक्षण; कभी मुख्यमंत्री उदीयमान खिलाड़ी, युवा कल्याण विभाग, विधायक चैंपियन ट्रॉफी, विद्यालयी खेलकूद, खेल महाकुंभ और न जाने कितने आयोजन। इसके साथ ऑनलाइन प्रशिक्षण, विभिन्न संस्थाओं और NGO के प्रशिक्षण तथा लगातार आने वाले डिजिटल कार्य।
सवाल यह नहीं है कि इनमें से कौन-सा कार्यक्रम गलत है। सवाल यह है कि इन सबके बीच बच्चे की नियमित पढ़ाई के लिए समय कितना बच रहा है?
एक ओर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की अपेक्षा की जाती है और दूसरी ओर शिक्षण के वास्तविक समय को लगातार अलग-अलग गतिविधियों में बाँटा जाता है। यह विरोधाभास कब तक चलेगा?
दीवारें रंग-बिरंगी हो सकती हैं। विद्यालयों की तस्वीरें सुंदर हो सकती हैं। कार्यक्रमों की रिपोर्टें आकर्षक हो सकती हैं। लेकिन कभी उन तस्वीरों से बाहर निकलकर यह भी देखना होगा कि बच्चों की कॉपियों में कितना लिखा गया, किताबें कितनी पढ़ी गईं, विषय की समझ कितनी विकसित हुई और उनकी बुनियादी शैक्षणिक नींव कितनी मजबूत हुई।
यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कई स्थानों पर पाठ्यपुस्तकों की उपलब्धता स्वयं समय पर सुनिश्चित नहीं हो पाती। ऐसे में यदि बच्चों का महत्वपूर्ण समय औपचारिक गतिविधियों और आयोजनों में चला जाए तो भाषा, गणित, विज्ञान, पुस्तक-पठन, तार्किक सोच और आगे की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए पर्याप्त समय आखिर बचेगा कितना?
निजी विद्यालयों में जहाँ विद्यार्थी कम उम्र से ही अपनी रुचि और भविष्य की संभावनाओं के अनुरूप पढ़ाई पर ध्यान देना शुरू कर देते हैं, वहीं सरकारी विद्यालयों का शिक्षक अनेक प्रशासनिक और गैर-शैक्षणिक जिम्मेदारियों के बीच उलझा दिखाई देता है। बाद में उन्हीं बच्चों से बेहतर परिणाम और प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता की अपेक्षा की जाती है।
फिर सबसे बुनियादी सवाल—विद्यालय आखिर हैं किसलिए?
शिक्षा देने के लिए या हर योजना और अभियान के प्रचार-प्रसार का मंच बनने के लिए?
शिक्षक का मूल दायित्व बच्चों को पढ़ाना है। लेकिन यदि उसका अधिकांश समय फोटो, वीडियो, रिपोर्ट, ऑनलाइन फॉर्म, व्हाट्सऐप संदेश और विभिन्न आयोजनों में चला जाएगा, तो उसके पास गंभीर कक्षा शिक्षण की तैयारी के लिए कितना समय बचेगा?
स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब विद्यालयों में शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों के पद पहले से ही रिक्त हों। कई विद्यालयों में प्रधानाचार्य अथवा विद्यालय प्रमुख के पद खाली हैं। कई जगह लिपिक और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी तक उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में शिक्षक को कार्यालय संबंधी कार्य भी करने पड़ते हैं। जब एक ही व्यक्ति से शिक्षक, कार्यालय सहायक, रिपोर्ट तैयार करने वाला कर्मचारी और कार्यक्रम आयोजक—सभी भूमिकाएँ निभाने की अपेक्षा की जाएगी, तो उसके मूल दायित्व यानी शिक्षण पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझने की आवश्यकता है—सरकारी योजनाओं का धरातल तक पहुँचना आवश्यक है, लेकिन किसी योजना की सफलता का अर्थ यह नहीं हो सकता कि उसके क्रियान्वयन में विद्यालय का मूल शिक्षण कार्य ही प्रभावित होने लगे।
सरकारी व्यवस्था में ऊपर से नीचे तक योजनाओं के क्रियान्वयन का दबाव रहता है। अधिकारी अपने स्तर पर लक्ष्य पूरा करना चाहते हैं, कर्मचारी उसके अनुपालन में जुटते हैं और अंततः उसका बड़ा हिस्सा विद्यालय और शिक्षक तक पहुँचता है। परिणाम यह होता है कि जिस शिक्षक से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की अपेक्षा की जाती है, वही लगातार बढ़ते गैर-शैक्षणिक कार्यों के कारण कक्षा से दूर होता जाता है।
यही वह बिंदु है जहाँ शिक्षक का ‘गुरुत्व’ उसके मूल दायित्व—शिक्षण—से दूर होने लगता है।
शिक्षक यदि लगातार कागजों, रिपोर्टों, फोटो-वीडियो, ऑनलाइन निर्देशों और कार्यक्रमों के बीच खिंचता रहेगा, तो उसका सबसे महत्वपूर्ण समय बच्चों के साथ कक्षा में बिताया जाने वाला समय कम होता जाएगा। और जब शिक्षक तथा विद्यार्थी के बीच सीखने-सिखाने का वह नियमित संबंध कमजोर होगा, तो उसका सीधा प्रभाव शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ेगा।
इसलिए समस्या गतिविधियों से नहीं, गतिविधियों की अति और उनके अनियोजित विस्तार से है।
महीने में दो सार्थक और उद्देश्यपूर्ण गतिविधियाँ भी पर्याप्त हो सकती हैं, यदि उनका संबंध बच्चों के वास्तविक सीखने से हो। हर दिन विद्यालय को किसी न किसी आयोजन में बदल देना आवश्यक नहीं है।
कुछ दिन विद्यालय को सिर्फ विद्यालय रहने दीजिए।
शिक्षक को कक्षा में जाने दीजिए।
बच्चों को किताबों के साथ समय बिताने दीजिए।
उन्हें सवाल पूछने, सोचने, समझने और सीखने दीजिए।
कार्यक्रम कम हों, पढ़ाई अधिक हो।
रिपोर्ट कम हो, वास्तविक सीख अधिक हो।
प्रचार कम हो, शिक्षा अधिक हो।
क्योंकि अंततः सवाल फोटो की संख्या का नहीं होगा। सवाल यह होगा कि इन वर्षों में हमने बच्चों को कितना पढ़ाया, कितना सिखाया और उन्हें कितना सोचने-समझने योग्य बनाया।
वरना एक दिन हमारे पास कार्यक्रमों की हजारों तस्वीरें और रिपोर्टों के सैकड़ों पन्ने होंगे, लेकिन मन के किसी कोने से आवाज आएगी—आखिर हम विद्यालय में आए किसलिए थे और कर क्या गए?
इसलिए विद्यालय को विद्यालय ही रहने दीजिए, उसे रोज़ का मेला मत बनाइए।
यदि स्थिति कुछ और वर्षों तक इसी तरह चलती रही तो सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था, जो कभी समाज के हर वर्ग की साझी व्यवस्था हुआ करती थी और आज आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों की सबसे बड़ी आवश्यकता है, गंभीर संकट में पहुँच सकती है।
लेकिन अभी सब कुछ समाप्त नहीं हुआ है।
इन विद्यालयों में जब तक एक भी समर्पित शिक्षक मौजूद है, तब तक उम्मीद बाकी है। वह शिक्षक तमाम दबावों, अतिरिक्त जिम्मेदारियों और गैर-शैक्षणिक कार्यों के बावजूद बच्चों को पढ़ाने और विद्यालय को बचाए रखने के लिए तैयार है।
बस उसे पढ़ाने दीजिए।
उसे कागजों, रिपोर्टों, फोटो-वीडियो, व्हाट्सऐप संदेशों और रोज़-रोज़ के आयोजनों में मत उलझाइए।
बच्चों को सीखने का समय दीजिए।
शिक्षकों को पढ़ाने का समय दीजिए।
और विद्यालयों को विद्यालय की तरह काम करने दीजिए।
क्योंकि यदि हम सचमुच चाहते हैं कि सरकारी विद्यालयों के बच्चे निजी विद्यालयों के बच्चों के साथ बराबरी से खड़े हों, तो सबसे पहले हमें उन्हें सजावट, आयोजन और रिपोर्ट नहीं, पर्याप्त शिक्षण समय देना होगा।
शिक्षा व्यवस्था को बचाने के लिए हर दिन नया कार्यक्रम जरूरी नहीं है—कभी-कभी सिर्फ शिक्षक को पढ़ाने और बच्चे को पढ़ने देना ही सबसे बड़ा सुधार होता है।

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