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गुजरात में चारधाम मंदिर लोकार्पण पर मां माटी मातृभूमि और मातृभाषा को याद किया

Report- Vinod Rawat Mankoti

अहमदाबाद: गढ़देशीय मित्र मंडल अहमदाबाद द्वारा चारधाम मंदिर का निर्माण सणसोली गांव सिद्ध विनायक मंदिर नैनपुर के पास डाकोर भक्ति मार्ग पर लगभग एक एकड़ भूमि पर लोकार्पण किया गया। इस अवसर पर उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री श्री त्रिवेंद्र रावत, ट्रष्टी लक्ष्मी प्रसाद गैरोला, जी एम शर्मा, डॉ राजीव पालीवाल दिल्ली से उतराखण्डी भाषा प्रसार समिति के अध्यक्ष डॉ बिहारीलाल जलन्धरी मुंबई से हिमालय पर्वतीय संघ के पूर्व अध्यक्ष व भाषा प्रसार समिति के महाराष्ट्र के संयोजक श्री चामू सिंह राणा आदि उपस्थित हुए। इस अवसर पर श्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा कि लोग पूरे देश से लाखों की संख्या में लोग उत्तराखंड के चारों धामों के दर्शन करने आते हैं। जहां उनके लिए हर प्रकार की सुविधाएं प्रदान की गई हैं। मंदिर समिति के अध्यक्ष श्री लक्ष्मी प्रसाद गैरोला ने कहा कि जो लोग किसी कारण से चारधाम यात्रा दर्शन करने नहीं जा पाते उन्हें इस स्थल पर बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री धाम के दर्शन करने का अवसर मिलेगा। समिति के अध्यक्ष श्री जनार्दन रणकोटी ने कहा कि इस मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं यात्रियों को सभी तरह की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। हमने उतराखण्ड के चारों धामों को उन भक्तों के लिए एक स्थान पर स्थापना की है जो किसी कारण से इन धामों में जाने से असमर्थ हैं। यहां गंगोत्री यमनोत्री बदरी नाथ केदारनाथ के दर्शन एक साथ हो सकेंगे। इसके निर्माण में सैकड़ों ईश्वर भक्तों श्रद्धालुओं का सहयोग मिल रहा है।
कार्यक्रम में डॉ बिहारीलाल जलन्धरी ने चारधाम मंदिर के कार्यकर्ताओं को बहुत बृहद मंदिर बनाने की सराहना की तथा उतराखण्ड समाज को अपनी मां माटी मातृभूमि और मातृभाषा की याद दिलाते कहा कि हमें साल में दो बार अपने बच्चों को गांव घर अपनी जमीन जायदाद से परिचय कराना चाहिए। उन्होंने गढ़वाली में कहा कि आज हम गढ़वाली कुमाऊनी बोलना भूल गए हैं जैसे हमने कक्षा छह से अंग्रेजी पढ़ी उसी तरह हमारे बच्चे अपनी बोली भाषा को भी लिख पढ़ सकते हैं। उन्होंने उतराखण्डी भाषा में पहले पाठ्यक्रम मौळ्यार का जिक्र करते कहा कि इसे पढ़कर हमारा समाज तू गढ़वाली मैं कुमाऊनी वह जौनसारी की भावना से ऊपर उठकर उत्तराखंड और उत्तराखंडी से पहचाना जाएगा। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में एक समिति का गठन हो जो एक विषय तैयार करे जिसमें पांच पाठ कुमाऊनी पांच गढ़वाली और इसी तरह कविताएं व उतराखण्ड की जिन बोलियों का साहित्य है उनसे एक विषय तैयार कर बच्चों को पढ़ाया जाय और परीक्षा में दस सवाल पूछकर केवल पांच के उत्तर देने कहा जाए तो निश्चित ही उत्तराखंड से भाषाई विभिन्नता एक दिन अवश्य समाप्त होगी। जब हिंदी में तुलसीदास सूरदास रसखान कबीर जायसी आदि विभिन्न भाषाओं के कालजई साहित्यकारों को पढ़ाया जा सकता है तो उतराखण्डी भाषा में सभी बोलियों के साहित्यकारों को क्यों नहीं ?

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