Home उत्तराखंड गैरसैण सिलंगा गांव में पाण्डव लीला की तैयारियां जोरों पर, शेर की आत्मा के आह्वान की अनूठी परंपरा बनेगी आकर्षण का केंद्र
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सिलंगा गांव में पाण्डव लीला की तैयारियां जोरों पर, शेर की आत्मा के आह्वान की अनूठी परंपरा बनेगी आकर्षण का केंद्र

रिपोर्ट  हिमांशु मेहरा

गैरसैंण (चमोली)। चमोली जनपद के गैरसैंण विकासखंड के सिलंगा गांव में पारंपरिक पाण्डव लीला के आयोजन को लेकर तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। इस धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन को लेकर ग्रामीणों में खासा उत्साह देखने को मिल रहा है। गांव के छोटे-बड़े सभी लोग एकजुट होकर पाण्डव लीला को भव्य रूप देने में जुटे हुए हैं।

इन दिनों पाण्डव लीला की विभिन्न पारंपरिक प्रस्तुतियों, नृत्य एवं अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों का विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है। युवा, बुजुर्ग और बच्चे सभी उत्साहपूर्वक इसमें भाग ले रहे हैं। ग्रामीणों की सामूहिक सहभागिता से गांव में उत्सव जैसा माहौल बना हुआ है।

शेर की आत्मा के आह्वान की अनूठी परंपरा

सिलंगा गांव की पाण्डव लीला अपनी विशिष्ट परंपराओं के लिए विशेष पहचान रखती है। गांव से जुड़ी एक लोकमान्यता के अनुसार, प्राचीन समय में एक शेर प्रतिदिन मां के चरणों का स्पर्श करने गांव आया करता था। मान्यता है कि वह बिना किसी को नुकसान पहुंचाए वापस लौट जाता था।

इसी लोकमान्यता और शेर की स्मृति से जुड़ी एक अनूठी परंपरा के तहत पाण्डव लीला के 17वें दिन शेर की आत्मा का आह्वान किया जाता है। यह परंपरा सिलंगा गांव की धार्मिक आस्था, लोकविश्वास और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है। इस अनूठी परंपरा को देखने के लिए लोगों में विशेष उत्सुकता बनी रहती है।

शिक्षा के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान

इस महत्वपूर्ण जानकारी को साझा करने के लिए एडुटेक के निदेशक एवं संस्थापक श्री एच.एस. नेगी जी का विशेष आभार व्यक्त किया गया है।

श्री नेगी जी विगत कई वर्षों से पहाड़ी क्षेत्रों में कंप्यूटर साक्षरता को बढ़ावा देने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। इसके साथ ही वे ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों को अंग्रेजी स्पीकिंग कोर्स की सुविधा भी उपलब्ध करा रहे हैं। उनके प्रयासों से ग्रामीण बच्चों को आधुनिक शिक्षा, कंप्यूटर तकनीक और अंग्रेजी भाषा के ज्ञान से जोड़ने में महत्वपूर्ण मदद मिल रही है।

लोकसंस्कृति और सामूहिक एकता का प्रतीक

सिलंगा गांव की पाण्डव लीला केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति, पारंपरिक विरासत और सामूहिक एकता का भी प्रतीक है। ग्रामीणों के सामूहिक प्रयासों से यह आयोजन पहाड़ की प्राचीन परंपराओं को जीवंत बनाए रखने और नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा है।

सिलंगा गांव की यह अनूठी पाण्डव लीला आने वाले दिनों में क्षेत्र के धार्मिक एवं सांस्कृतिक आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनने की उम्मीद है।

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