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सरकारी जमीनों की बिक्री पर रोक और UIIDB भंग करने की मांग, मुख्यमंत्री को भेजा ज्ञापन

सरकार ने मांगें नहीं मानीं तो प्रदेशव्यापी आंदोलन की चेतावनी

देहरादून, 10 सितम्बर। उत्तराखंड में सरकारी जमीनों को नीलामी एवं लीज के माध्यम से निजी और व्यावसायिक उपयोग के लिए दिए जाने के विरोध में विभिन्न सामाजिक एवं जन संगठनों ने आज देहरादून में जोरदार आवाज उठाई। संगठनों के प्रतिनिधियों ने जिलाधिकारी देहरादून के माध्यम से मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को ज्ञापन भेजकर उत्तराखंड इन्वेस्टमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट बोर्ड (UIIDB) को तत्काल भंग करने तथा सरकारी विभागों की जमीनों की बिक्री, नीलामी और दीर्घकालीन लीज पर रोक लगाने की मांग की।
बैठक में वक्ताओं ने कहा कि राज्य सरकार निवेश को बढ़ावा देने के नाम पर बड़ी मात्रा में सरकारी भूमि को निजी और व्यावसायिक परियोजनाओं के लिए उपलब्ध कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ा रही है। आंदोलनकारियों का आरोप है कि UIIDB के माध्यम से सरकारी विभागों की जमीनों को होटल, रिसॉर्ट, स्पा एवं वेलनेस सेंटर, आवासीय कॉलोनी तथा अन्य व्यावसायिक गतिविधियों के लिए उपलब्ध कराने की तैयारी की जा रही है।
वक्ताओं ने विशेष रूप से करीब 7000 बीघा सरकारी जमीन से जुड़े प्रस्तावों और प्रक्रियाओं पर सवाल उठाते हुए सरकार से पूरी जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की। उन्होंने कहा कि सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि राज्य में अब तक कितनी सरकारी जमीन किस विभाग से, किस संस्था या व्यक्ति को, किस उद्देश्य से और किन शर्तों पर दी गई है। इसके लिए सरकारी जमीनों के आवंटन, नीलामी, बिक्री एवं लीज का श्वेतपत्र जारी करने की मांग भी उठाई गई।

आंदोलनकारियों ने कहा कि सरकार निवेश और रोजगार की बात करती है, लेकिन जिन टेंडर और नीलामी प्रक्रियाओं के माध्यम से जमीन उपलब्ध कराई जा रही है, उनमें निर्धारित पात्रता और आर्थिक शर्तें इतनी बड़ी हैं कि सामान्य उत्तराखंडी उद्यमी और स्थानीय कारोबारी उनके सामने प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते।

उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसी नीतियां स्थानीय लोगों के बजाय बड़े कॉरपोरेट समूहों और पूंजीपतियों के लिए अधिक अनुकूल हैं। वक्ताओं ने सवाल उठाया कि यदि उत्तराखंड में निवेश लाना ही उद्देश्य है तो सरकार को ऐसी नीति बनानी चाहिए, जिसमें स्थानीय युवाओं, उद्यमियों, महिला समूहों, सहकारिता संस्थाओं और छोटे एवं मध्यम कारोबारियों को प्राथमिकता मिले।

वक्ताओं ने कहा कि उत्तराखंड की जनता लंबे समय से भू-कानून और राज्य के प्राकृतिक एवं भूमि संसाधनों की सुरक्षा को लेकर संघर्ष कर रही है। ऐसे समय में सरकारी जमीनों को बड़े व्यावसायिक प्रोजेक्टों के लिए उपलब्ध कराने की प्रक्रिया गंभीर चिंता का विषय है।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड केवल निवेश का बाजार नहीं बल्कि यहां के लोगों की भावनाओं, आजीविका और आने वाली पीढ़ियों की संपत्ति है। सरकारी जमीन जनता की सामूहिक संपत्ति है और उसका उपयोग व्यापक जनहित में होना चाहिए।
आंदोलनकारियों ने सरकार से मांग की कि UIIDB के माध्यम से सरकारी जमीनों से संबंधित सभी प्रक्रियाओं को तत्काल सार्वजनिक किया जाए, प्रस्तावित नीलामी एवं लीज प्रक्रियाओं पर रोक लगाई जाए तथा पूरे मामले की पारदर्शी समीक्षा की जाए।
सामाजिक संगठनों ने मुख्यमंत्री से स्पष्ट मांग की कि UIIDB को तत्काल भंग किया जाए और सरकारी विभागों की जमीनों की बिक्री एवं नीलामी पर रोक लगाई जाए। साथ ही सरकारी जमीनों के पूर्व में किए गए आवंटन एवं लीज की भी समीक्षा कर पूरी जानकारी जनता के सामने रखी जाए।
वक्ताओं ने चेतावनी दी कि यदि सरकार निर्धारित समय सीमा के भीतर इन मांगों पर सकारात्मक निर्णय नहीं लेती है तो आंदोलन को देहरादून तक सीमित नहीं रखा जाएगा। इसके बाद विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक एवं जन संगठनों को साथ लेकर प्रदेशव्यापी व्यापक जनआंदोलन शुरू किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए जनता पहले भी संघर्ष करती रही है और आवश्यकता पड़ने पर एक बार फिर सड़कों पर उतरकर अपनी आवाज बुलंद करेगी।

ज्ञापन देने वालों में कमला पंत, मोहित डिमरी, निर्मला बिष्ट, अनिल डोभाल, विमला कोली, मंजू बलोदी, विजया नैथानी, आशीष नौटियाल, नन्द किशोर नौटियाल, अमित परमार, अम्बुज शर्मा, मुरली सिंह रावत सहित अनेक सामाजिक कार्यकर्ता एवं जन संगठनों के प्रतिनिधि शामिल रहे।

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