पहाडो मे जनगणना 2027, और गांव मे जंगली जनवरो का डर!
रिपोर्ट महिपाल रावत
जैसा की विधित है की पहाडो मे पलायन होते गांव जंगल बनते गांव के गांव और बढता जंगली जानवरो का डर साथ मे आवागमन मे रास्तो मे दहशत आम हो चला है। ऐसे मे आजकल शिक्षको का डर भी जनगणना के लिए गांव गांव जाना आने जाने मे डर होना भी उचित है।
जंगली जानवरों का भय कब अधिक रहता है??
अधिकांश का उत्तर होगा कि रात में??
यह धारणा अब मिथक बनती जा रही है चाहे सुअर हो,भालू या गुलदार इनकी धमक दिन में ही हो रही है
एक शिक्षक साथी जनगणना कार्य से आ रहे थे तो उन्हें दिन में एक गांव से आते समय सुअरो का झुंड दिखाई दिया तो दूसरे गांव से आते हुए गुलदार!!
वहीं क्षेत्र में एक सप्ताह में दूसरी बार गुलदार अपने दो बच्चों के साथ सुबह 6 बजे से 6 बजकर 15 मिनट के मध्य दिखाई देना विद्यालय जाने वाले शिक्षकों, कर्मचारियों के साथ -साथ, नन्हे मुन्ने, छात्र -छात्राओं के लिए खतरा बना हुआ है ,साथ ही गांव में रह रहे कुछ परिवारों के लिए संकट की स्थिति बनी हुई है
वन विभाग शायद कोई अप्रिय घटना की प्रतीक्षा कर रहा होगा??
ग्रीष्म कालीन अवकाश पर घर आने वाले प्रवासियों को पता नहीं है कहां पर और किस जगह पर जंगली जानवरों क का उनसे आमना सामना हो जाये
सरकार ने चैक बंदी की पहल की है उसका स्वागत करते हैं लेकिन बेहतर होगा कि जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय प्राणी उद्यान तथा जंगली जानवरों आतंकित गांवों में कृषि घेर बाड़ की योजना को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों रह रहे मूलनिवासियों को भी पलायन के लिए मजबूर न होना पड़े!
वैसे भी भवन गणना 2026 ने पलायन की स्थिति बयां कर दी है आंकड़े आने शेष है
सरकार की प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि पर्वतीय क्षेत्रों में परिसीमन जनसंख्या के आधार पर न हो और यहां की भौगोलिक स्थिति के अनुरूप हो ताकि जितने परिवार पर्वतीय क्षेत्रों में रह रहे हैं उन परिवारों की जान माल, पशुपालन, शिक्षा स्वास्थ्य,कृषि तथा भूमि की रक्षा हो सके!
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