अल्‍मोडा

उत्तराखंड का पारंपरिक पर्व चैत्र मास में विवाहित बहन ,बेटियों भिटौली उपहार।

रिपोर्ट प्रताप सिंह नेगी अल्‍मोडा

उत्तराखंड के कुमांऊ गढ़वाल में पारं परिक व अत्यंत भावात्मक प्रथा विवाहित ,बहन बेटियों को चैत्र मास में भिटौली(कलेऊ )देने‌की प्रथा आज भी प्रचलित है।
हर साल चैत्र मास में मायके की तरफ से अपनी बहिन बेटियों भिटौली उपहार में पकवान व वस्त्र दिया जाता है।हर विवाहित महिला को चैत्र के मास में भिटौली उपहार का बेसब्री से इंतजार रहता है।उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन होने के कारण पकवान व वस्त्र प्रचलन थोडा़‌ कम होते जा रहा है।
अलग अलग राज्यों नौकरी पेशे वाले नकदी,पैसा दे देते है विवाहित महिलायें उस पैसों से घर पकवान बनाकर अपने गांव मे बितरित करती है।

अल्मोड़ा से प्रताप सिंह नेगी ने बताया चैत्र के मास में खेतों में घास काटती हुए महिलाओं के आस पास घुघति पक्षी गुनगुनाकर महिलाओं को भिटौली यादें दिलाती है।
नेगी ने बताया प्राचीन काल यातायात के अभाव था लड़कियों के ससुराल दूर दूर हुआ करते थे।भिटौली के मास में भाई ने अपनी मां को मां इस बार अपनी बहिन मै भिटौली देने जाता हूं।मां ने बोला बेटा बहुत दूर जंगल का रास्ता है।बेटे ने कहा कोई बात नही मै जाता हूं भाई अपने बहिन को भिटौली देने चला गया जब बहिन घर पहुंचता है तो खोतों में काम करके थक कर सो गई भाई उस भिटौली के समान को उसके बगल में रखकर इंतजार किया बहिन सोई थी भाई वापस चला गया।जब शाम के टाइम पक्षियों चढ़चड़ाट हुई।बहिन ने देखा तो उसका भाई उसके लिए भिटौली लाया था।इधर देखा उधर देखा भाई नही दिखा।
बहिन दुखी हो गई भै भूको मै सिती उसने अपने प्राण त्याग दिये बाद व बहिन घुघति पक्षी के रुप अवतारित हुई।आज भी कहावत है घुघति पक्षी की हर साल चैत्र मास में खेतों में महिलाओं को भिटौली की यादें दिलाने के लिए गुनगुनाती है।
भिटौली के बारे लोकगीत बने हुए है।,ना बासा घुघति चैत की याद आ जैछौ मैतें की!

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