Home उत्तराखंड चुनावी समय पर अकसर दहशत में आ जाते हैं पहाड़ के अधिकतर एकल टैक्सी/बस स्वामी/चालक और यात्रियों की भी बढ़ जाती है परेशानियां..!
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चुनावी समय पर अकसर दहशत में आ जाते हैं पहाड़ के अधिकतर एकल टैक्सी/बस स्वामी/चालक और यात्रियों की भी बढ़ जाती है परेशानियां..!

रिपोर्ट प्रभुपाल सिंह रावत

चुनावी समय और मुख्यमंत्री या केंद्रीय मंत्रियों के पहाड़ी क्षेत्रों के दौरे पर अकसर दहशत में आ जाते हैं पहाड़ के अधिकतर एकल टैक्सी/बस स्वामी/चालक और यात्रियों की भी बढ़ जाती है परेशानियां..!

उत्तराखंड की पहाड़ी क्षेत्रों में धड़ले से प्राइवेट नंबर कार में टैक्सियों/बसों की सवारी ढोने वालों के कारण पहले से ही सवारियों की कमी की मार झेल रहे उत्तराखंड की पहाड़ी क्षेत्र के कोमर्शियल टैक्सी और बस चालकों के लिए जैसे ही लोकसभा चुनाव 2024 की घोषणा हुई वैसे ही उत्तराखंड की पहाड़ी क्षेत्रों में एकल टैक्सी/बस स्वामी/चालक दहशत में रहने लगे हैं!
आजकल उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में अधिकतर जगहों पर देखने को मिलता है कि उत्तराखंड पुलिस और उत्तराखंड परिवहन विभाग से आरटीओ मिलकर उत्तराखंड नंबर के टैक्सी और GMOU/KMOU के बस स्वामियों/चालकों को रोकते हैं और उन्हें इलेक्शन की ड्यूटी के लिए अपना वाहन देने के लिए मजबूर करते हैं, टैक्सी/बस चालकों को इसमें भी कोई एतराज नहीं होता लेकिन सरकार की तरफ से चुनाव ड्यूटी के लिए रिजर्व किए गए वाहन को बाउंडिड कर तो दिया जाता है और बोला जाता है कि आप जब तक चुनाव प्रक्रिया चलती है तब तक जब भी हमें वाहन की जरूरत होगी आपको हाजिर होना होगा चाहे आप कहीं पर भी हो ऐसे में वाहन चालक अपने रुटीन के काम को करते हुए डरते हैं कि कहीं अचानक बुलावा ना आ जाए और दूसरा चुनाव ड्यूटी के दौरान विभाग द्वारा वाहन में ड्यूटी के लिए किलोमीटर के हिसाब से डीजल तो भरवा दिया जाता है लेकिन घर से ड्यूटी तक पहुंचने व ड्यूटी से वापस घर जाने का डीजल/पैट्रोल का खर्चा भी शायद ही मिलता होगा हालांकि चुनाव के दौरान ड्यूटी करने के लिए वाहन स्वामियों को कुछ न कुछ खर्चा जरूर दिया जाता है मगर वो भी कुछ फॉर्मेलिटी पूरी करने के कुछ दिनों के इंतजार के बाद ही और चुनाव ड्यूटी में अटैच की गई टैक्सी और बस के चालकों के लिए ड्यूटी के दौरान कहीं पर रात्रि विश्राम या खाने पीने का उचित बंदोबस्त भी नहीं किया जाता है.. ऐसे में चुनावी ड्यूटी के लिए बाउंड किए गए टैक्सी/बस (वाहन) स्वामियों के लिए अपना घर का खर्चा चलाना थोड़ा मुश्किल सा हो जाता है। चुनाव आयोग को चुनावी ड्यूटी के लिए अटैच किए गए वाहन के स्वामियों को या तो वैसे ही उचित दर से भुगतान करना चाहिए जैसे सरकारी विभागों में परमानेंट अनुबंधित वाहनों का भुगतान होता है या फिर वाहन की कैपेसिटी के हिसाब से वाहन का किराया देना चाहिए अन्यथा चुनावी ड्यूटी में एकल टैक्सी/बस स्वामियों/चालकों के वाहनों की जगह सरकारी विभागों के ठेकेदारों के वाहनों को ही चुनाव ड्यूटी के लिए लगाना चाहिए या फिर टेंडर प्रक्रिया से चुनाव ड्यूटी के लिए वाहनों का इंतजाम करना चाहिए। ऐसे ही जब कभी पहाड़ी क्षेत्र में मुख्यमंत्री या केंद्रीय मंत्रियों का दौरा होता है तब भी सरकारी विभाग स्थानीय टैक्सी चालकों को अपनी टैक्सियां देने को कहते हैं।

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