देहरादून।
उत्तराखण्ड में जमीनों की धड़ल्ले से हो रही खरीद-फरोख्त पर विवाद का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। हालिया प्रकरणों के सार्वजनिक होने के बाद उत्तराखण्ड क्रान्ति दल एक बार फिर इस गंभीर मुद्दे पर मुखर हो गया है। कचहरी रोड स्थित केंद्रीय कार्यालय में भू-कानून और सरकार के प्रस्तावित ‘देवभूमि कार्ड’ को लेकर पार्टी की महत्वपूर्ण मंथन बैठक आयोजित की गई।
बैठक में राज्य सरकार द्वारा प्रस्तावित ‘देवभूमि कार्ड’ की अवधारणा, प्रदेश में लगातार हो रही जमीनों की खरीद-फरोख्त तथा मूल निवासियों के अधिकारों से जुड़े गंभीर विषयों पर विस्तृत चर्चा की गई।
बैठक में वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि उत्तराखण्ड के मूल निवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए मजबूत, स्पष्ट और प्रभावी भू-कानून की आवश्यकता है। सरकार जिस प्रकार ‘देवभूमि कार्ड’ की व्यवस्था लागू करने की बात कर रही है, वह प्रदेश की मूल समस्या का समाधान नहीं है। इससे उत्तराखण्ड के मूल निवासियों के संवैधानिक, सामाजिक और भूमि संबंधी अधिकारों को वह संरक्षण नहीं मिलेगा जिसकी आज आवश्यकता है।
उत्तराखण्ड क्रान्ति दल के मूल निवास भू-कानून प्रकोष्ठ के अध्यक्ष लूशुन टोडरिया ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान समय में प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में बाहरी व्यक्तियों एवं प्रॉपर्टी डीलरों द्वारा सोशल मीडिया के माध्यम से खुलेआम जमीन खरीदने और बेचने के विज्ञापन प्रसारित किए जा रहे हैं। यह स्थिति उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक पहचान, जनसांख्यिकीय संतुलन और प्राकृतिक संसाधनों के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रही है।
टोडरिया ने आरोप लगाया कि इन गतिविधियों पर प्रभावी रोक लगाने के बजाय राज्य सरकार उदासीन रवैया अपनाए हुए है। उन्होंने कहा कि जिस तरह पौड़ी जिले के सबदरखाल में 144 नाली जमीन बिकने का मामला सामने आया है, उससे स्पष्ट होता है कि उत्तराखण्ड सरकार का भू-कानून जमीनों की बेतहाशा खरीद-फरोख्त पर रोक लगाने में पूरी तरह विफल साबित हो रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान भू-कानून भी भू माफियाओं के हितों को ध्यान में रखकर बनाया गया प्रतीत होता है।
टोडरिया ने उत्तराखण्ड सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर जल्द ही प्रदेश में जमीनों की इस बेतहाशा खरीद-फरोख्त पर रोक नहीं लगाई गई तो आगामी विधानसभा चुनाव में उत्तराखण्ड क्रान्ति दल गांव-गांव जाकर सरकार की इस हिमालय विरोधी सोच और उसकी भू-कानून नीति की पोल जनता के सामने खोलेगा। उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड की जमीन को बाजार बनने नहीं दिया जाएगा और इस लड़ाई को निर्णायक स्तर तक ले जाया जाएगा।
केंद्रीय महामंत्री सेवानिवृत्त कर्नल देवरानी ने कहा कि जहां प्रदेश की जनता उत्तराखण्ड सरकार से मूल निवास प्रमाण-पत्र की मांग कर रही है, वहीं दूसरी ओर सरकार ‘देवभूमि कार्ड’ बनाकर 15 साल के निवास के आधार पर निवास प्रमाण-पत्र देने की तैयारी कर रही है। उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था उत्तराखण्ड के मूल निवासियों के अधिकारों पर सीधा हमला है। सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वह प्रदेश के मूल निवासियों के अधिकारों की रक्षा करना चाहती है या बाहरी लोगों के लिए स्थायी बसावट का रास्ता आसान करना चाहती है।
केंद्रीय प्रवक्ता मीनाक्षी घिल्डियाल ने कहा कि एक ओर सरकार सशक्त भू-कानून लागू होने के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी ओर प्रदेश में भूमि की अनियंत्रित खरीद-फरोख्त लगातार जारी है। यदि वास्तव में भू-कानून प्रभावी होता तो प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में जमीनों की खरीद-बिक्री का इस प्रकार खुलेआम प्रचार-प्रसार संभव नहीं होता। सरकार को अपने दावों और जमीन पर दिखाई दे रही वास्तविक स्थिति के बीच का अंतर जनता को बताना चाहिए।
सैनिक प्रकोष्ठ के अध्यक्ष महिपाल पुंडीर ने कहा कि उत्तराखण्ड राज्य का निर्माण केवल भौगोलिक सीमाओं के लिए नहीं हुआ था, बल्कि यहां के मूल निवासियों की संस्कृति, पहचान, संसाधनों और अधिकारों की रक्षा के उद्देश्य से भी हुआ था। इसलिए सरकार को प्रतीकात्मक योजनाओं के बजाय मूल निवास की स्पष्ट परिभाषा, सख्त भू-कानून और भूमि संरक्षण की प्रभावी व्यवस्था लागू करनी चाहिए।
तराई प्रभारी राजेंद्र बिष्ट ने राज्य सरकार से मांग की कि प्रदेश में प्रभावी एवं कठोर भू-कानून को पूरी तरह लागू किया जाए और मूल निवासियों के अधिकारों को कानूनी संरक्षण प्रदान किया जाए। उन्होंने कहा कि जमीनों की खरीद-फरोख्त के नाम पर उत्तराखण्ड के भविष्य के साथ खिलवाड़ किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा।
केंद्रीय प्रवक्ता प्रमोद काला ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सरकार को पर्वतीय क्षेत्रों में अनियंत्रित भूमि खरीद-फरोख्त पर तत्काल रोक लगानी चाहिए। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के माध्यम से खुलेआम चल रहे भूमि कारोबार की निगरानी की जाए और भू-कानून का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।
बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि उत्तराखण्ड क्रान्ति दल आने वाले समय में इस मुद्दे पर और अधिक आक्रामक रुख अख्तियार करेगा। पार्टी प्रदेशभर में जनजागरण अभियान चलाकर आम जनता को भू-कानून, मूल निवास और जमीनों की हो रही खरीद-फरोख्त के वास्तविक स्वरूप से अवगत कराएगी। आवश्यकता पड़ने पर इस मुद्दे को लेकर लोकतांत्रिक तरीके से व्यापक जनआंदोलन भी किया जाएगा।
बैठक का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि उत्तराखण्ड क्रान्ति दल प्रदेश की अस्मिता, जल-जंगल-जमीन और मूल निवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए अपना संघर्ष निरंतर जारी रखेगा।
पार्टी सशक्त भू-कानून और मूल निवास की प्रभावी व्यवस्था लागू कराने के लिए हर स्तर पर आवाज बुलंद करेगी तथा उत्तराखण्ड की जमीन और पहचान को बचाने की इस लड़ाई को निर्णायक मुकाम तक पहुंचाएगी।
बैठक में मोहन सिंह असवाल, मुकेश बहुगुणा, टीकम राठौड़, निरंजन चौहान, राकेश नेगी, प्रवीण रतूड़ी, कपिल रावत, पंचम सिंह, रमेश चंद्र, पंकज पोखरियाल, अमित कोटियाल, संदीप सिंह, दीप्ति दुधपुरी, दिनेश पंत, गंगा सिंह बिष्ट, नीटू सिंह पंवार, आनंद कोठारी, आर.सी. उनियाल आदि मौजूद रहे।

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